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Home Gurbani Lyrics

Guru Gobind Singh History in Hindi

श्री गुरु गोबिंद सिंह का संक्षिप्त जीवन रेखाचित्र

October 25, 2023
in Article, Biography, Sikh History
Guru Gobind Singh History in Hindi
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Sri Guru Gobind Singh's Life is a reaffirmation of Guru Nanak's divine mission and universal humanitarian cultural heritage. Because of the wide range of his dynamic vision and philosophy of life, the Guru became an uncompromising advocate of humanitarian principles by proclaiming "Maanas Ki Jaat Sabhe Eko Pehachaanbo (All mankind are one.)". He was the progenitor of the democratic revolution in India.

Life of Guru Gobind Singh Ji in Hindi

गुरु गोबिंद सिंह का जन्म गुरु तेग बहादुर, नौवें सिख गुरु और माता गुजरी के यहां पोह सुदी 7, 1723 बिक्रमी को हुआ था। तदनुसार दिसंबर 1666 में, शहर का नाम था पटना, जो कि अब बिहार प्रांत की राजधानी है। जिस स्थान पर गुरुदेव का जन्म हुआ, वहां तख्त श्री हरिमंदर साहिब गुरुद्वारा मौजूद है जो सिखों के पांच सबसे सम्मानित तख्तों में से एक है। उनका जन्म उस समय हुआ था जब उनके पिता पड़ोसी राज्य असम के दौरे पर थे और गुरु नानक के पवित्र वचनों का प्रचार कर रहे थे। 1670 ई. में पटना लौटकर उन्होंने अपने परिवार को पंजाब लौटने का निर्देश दिया। गुरु गोबिंद सिंह पांच साल की उम्र तक पटना में रहे, तत्पश्चात उन्हें आनंदपुर साहिब (पंजाब) भेजा गया।

बालक गोबिंद राय को शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में आनंदपुर (तब चक्क नानकी के नाम से जाना जाता था) ले जाया गया, जहां वे मार्च 1672 में पहुंचे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा में पंजाबी, ब्रज, संस्कृत और फारसी पढ़ना और लिखना शामिल था। आनंदपुर में, उन्होंने साहिब चंद की देखरेख में पंजाबी और काजी पीर मोहम्मद के अध्यापन में फारसी का अध्ययन शुरू किया। बज्जर सिंह राठौड़ व अन्यों से तलवार और भाले, धनुष और बाण, तोड़ेदार बंदूक और बारूद के उपयोग का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, बाल-गुरु ने आनंदपुर के आसपास के जंगलों में शिकार किया। उनके चाचा कृपाल चंद द्वारा भर्ती किए गए सिखों के एक छोटे दल ने युवा गुरु की सुरक्षा का कार्यभार संभाला।

पिता की शहीदी

गुरु गोबिंद सिंह मुश्किल से नौ वर्ष के थे, जब उनके जीवन में और साथ ही उस समुदाय के इतिहास में एक अचानक मोड़ आया, जिसका नेतृत्व करना उनके प्रारब्ध में था। उनके पिता ने उत्पीड़ित कश्मीरी पंडितों की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी, जिन्हें मुगल शासक औरंगजेब द्वारा जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा था। 11 नवंबर, 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग़ बहादुर जी को शहीद कर दिया गया था। नौवें गुरु की शहादत के बाद, उनके पुत्र गोबिंद राय ने सिख समुदाय का नेतृत्व स्वीकार किया।

गुरु गोबिंद सिंह को औपचारिक रूप से 1733 बिक्रमी / 29 मार्च, 1676 के बैसाखी के दिन गुरु-गद्दी पर सुशोभित किया गया। वे मुग़ल सरकार के समक्ष अपनी हिन्दू बिरादरी की कायरता और बुजदिली से बहुत क्षुब्ध थे। उन्होंने सिख जनता की कमान संभाली, और अपने दादा, छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद की तरह, हथियार उठा लिए। इस प्रकार गुरु गोबिंद सिंह उस औरंगजेब के लिए एक चुनौती बन गए जिसके अधीन विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था।

गुरुगद्दी पर

गुरु गोबिंद सिंह नौ साल की उम्र में सिखों के दसवें गुरु बने। गुरु गोबिंद सिंह के चार बेटे थे - अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह। गुरु गोबिंद सिंह में काव्य रचना की एक स्वाभाविक प्रतिभा थी और अपने प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने साहित्य अध्ययन व लेखन में अद्वितीय कार्य किया। 1684 में लिखी गई वार श्री भगौती जी की, जिसे लोकप्रिय रूप से चंडी दी वार कहा जाता है, उनकी पहली रचना थी और पंजाबी भाषा में उनकी एकमात्र प्रमुख कृति थी।

गुरु गोबिंद सिंह का अधिकांश साहित्यिक कार्य यमुना नदी के तट पर स्थित पौंटा साहिब में सम्पन्न हुआ जहां वे अप्रैल 1685 में अस्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए थे। उन्होंने ईश्वर की स्तुति में कई रचनाएँ लिखीं - जाप साहिब, अकाल उस्तत, ज्ञान प्रबोध, शबद हजारे, 33 सवैये, जफरनामा (जो अंतिम वर्षों में लिखा गया) आदि। उनका सम्पूर्ण साहित्य दसवें पादशाह का ग्रंथ के रूप में संकलित किया गया जिसे वर्तमान में श्री दसम ग्रंथ के नाम से जाना जाता है।

पौंटा में अपने प्रवास के दौरान, गुरु गोबिंद सिंह ने अपने खाली समय का उपयोग विभिन्न प्रकार के अभ्यासों, जैसे घुड़सवारी, तैराकी और तीरंदाजी का अभ्यास करने के लिए किया। लगभग 20 वर्षों की अवधि में, 1686 ईस्वी से 1706 ईस्वी के बीच, गुरु को लगभग 16 युद्धों का सामना करना पड़ा और उन्हें लड़ना पड़ा। जब रेड-क्रॉस सोसाइटी का विचार भी उत्पन्न नहीं हुआ था, गुरु गोबिंद सिंह के भाई घनईया जी जैसे सिखों ने युद्धों में समान रूप से घायल सैनिकों की सेवा करने का अद्भुत उदाहरण पेश किया।

खालसा पंथ

मार्च 1699 में, गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी। उन्होंने पंज प्यारों (पांच प्यारे) को अमृत अर्पित किया। उन सभी का उपनाम सिंह रखा गया, जिसका अर्थ है शेर। भविष्य में खालसा के पांच प्रतीकों को पहनना अनिवार्य किया गया, जिन्हें पंज कक्के या ककार कहा जाता है। इनमें केश, कंघा, कड़ा, कच्छ और कृपाण शामिल हैं। गुरु गोबिंद सिंह ने तब पांच शिष्यों से स्वयं भी दीक्षा संस्कार प्राप्त किया और उन्हें धर्म की अगुवाही सौंप दी। स्वयं का नाम बदलकर गोबिंद राय से गोबिंद सिंह कर लिया।

इस मौके पर हजारों लोगों ने खण्डे बाटे की पहुल (बड़े बर्तन में गुरबाणी पाठ करते हुए खण्डे से बताशे घोल कर बनाया गया शर्बत) धारण की. यह कोई प्रपंच या दिखावा नहीं बल्कि महान चमत्कार था जिससे उन्होंने जाति और पंथ के भेद को समाप्त कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को एक नई पहचान दी और उन्हें नैतिक रूप से उच्च जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। गरीबों और शोषितों की रक्षा करने के पवित्र कर्तव्य के साथ एक नए संगठन का जन्म हुआ। ये धर्म के निडर योद्धा थे।

शहादतें

नई व्यवस्था का जन्म मुगल बादशाह के लिए नासूर बन गया। 1705 में, गुरु गोबिंद सिंह के दो बड़े बेटे आनंदपुर साहिब में एक भीषण युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए। मुश्किल से सात और पांच साल के दो छोटे बच्चों को सरहिंद के गवर्नर ने जिंदा दीवारों में चिनवा कर शहीद कर दिया। राज्यपाल द्वारा बंदी बनाकर रखी गई गुरुदेव पातिशाह की माता गुजरी जी इस त्रासदी को बर्दाश्त नहीं कर सकीं।

इस प्रकार दसवें गुरु ने सत्य, न्याय और समानता के लिए अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया। उन्होंने खुद महाराष्ट्र में कार्तिक सुदी 5, 1765 बिक्रमी / 7 अक्टूबर 1708 को इस नश्वर संसार से अलविदा ली। ज्योति ज्योत समाने से पहले, उन्होंने घोषणा की कि उनके बाद कोई देह-धारी गुरु नहीं होगा और पवित्र पुस्तक, गुरु ग्रंथ साहिब से सभी आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किए जाएंगे।

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