Sabh Jee Tere Tu Vartada

Hukamnama Darbar Sahib, Amritsar

Sabh Jee Tere Tu Vartada Mere Har Prabh, Tu Jaane Jo Jee Kamayiye Ram; Raag Bihagda Mahalla 4th Sri Guru Ramdas Ji, Page 541 of Sri Guru Granth Sahib Ji.

Hukamnamaਸਭਿ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਤੂੰ ਵਰਤਦਾ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ
PlaceDarbar Sri Harmandir Sahib Ji, Amritsar
Ang541
CreatorGuru Ram Dass Ji
RaagBihagda
Date CEMay 29, 2022
Date NanakshahiJeth 16, 554
FormatJPEG, PDF, Text
TranslationsPunjabi, English, Hindi
TransliterationsNA
Hukamnama Darbar Sahib, Amritsar
ਬਿਹਾਗੜਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥ ਸਭਿ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਤੂੰ ਵਰਤਦਾ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਤੂੰ ਜਾਣਹਿ ਜੋ ਜੀਇ ਕਮਾਈਐ ਰਾਮ ॥ ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਨਾਲਿ ਹੈ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਸਭ ਵੇਖੈ ਮਨਿ ਮੁਕਰਾਈਐ ਰਾਮ ॥ ਮਨਮੁਖਾ ਨੋ ਹਰਿ ਦੂਰਿ ਹੈ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਸਭ ਬਿਰਥੀ ਘਾਲ ਗਵਾਈਐ ਰਾਮ ॥ ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਿਆਇਆ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਹਰਿ ਹਾਜਰੁ ਨਦਰੀ ਆਈਐ ਰਾਮ ॥੧॥ ਸੇ ਭਗਤ ਸੇ ਸੇਵਕ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਮਨਿ ਭਾਣੇ ਰਾਮ ॥ ਸੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪੈਨਾਇਆ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਅਹਿਨਿਸਿ ਸਾਚਿ ਸਮਾਣੇ ਰਾਮ ॥ ਤਿਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਲੁ ਉਤਰੈ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਨਦਰਿ ਨੀਸਾਣੇ ਰਾਮ ॥ ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਬੇਨਤੀ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਅਘਾਣੇ ਰਾਮ ॥੨॥ ਹੇ ਰਸਨਾ ਜਪਿ ਗੋਬਿੰਦੋ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਾਏ ਰਾਮ ॥ ਜਿਸੁ ਦਇਆ ਕਰੇ ਮੇਰਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਤਿਸੁ ਮਨਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ਰਾਮ ॥ ਜਿਸੁ ਭੇਟੇ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਸੋ ਹਰਿ ਧਨੁ ਨਿਧਿ ਪਾਏ ਰਾਮ ॥ ਵਡਭਾਗੀ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ਰਾਮ ॥੩॥ ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਦਾਤਾ ਰਾਮ ॥ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਈਐ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ਰਾਮ ॥ ਸਰਬ ਜੀਆ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਦਾ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਜਿਉ ਬਾਲਕ ਪਿਤ ਮਾਤਾ ਰਾਮ ॥ ਸਹਸ ਸਿਆਣਪ ਨਹ ਮਿਲੈ ਮੇਰੀ ਜਿੰਦੁੜੀਏ ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਰਾਮ ॥੪॥੬॥ ਛਕਾ ੧ ॥

English Translation

Bihagda Mahala – 4th ( Sabh Jee Tere Tu Vartada ) O, my Lord, True Master! All the beings in the world belong to You, as You pervade equally in all of them; and You know all our actions, whether good or bad. O, my soul! The Lord watches our actions though man normally denies having performed certain foul deeds. O, my soul! The self-willed persons always perceive the Lord at a distance and they waste all their efforts as they do not get any reward for their actions. O, Nanak! The Guru-minded persons always perceive the Lord close by. O, my soul! They have recited the Lord’s True Name and meditated on Him. (1)

O, my soul! The saints and disciples only serve the True Master and are liked by the Lord. The Guru-minded persons, who are united with the Lord through meditation by day and night, are received with honor and receive robes of honor at the Lord’s court. O, my soul! We could wash away the dirt of our minds in the company of such holy persons, as they are fully imbued with the love of the Lord, and they are bestowed by the Lord with His Grace, being His favorites. O, Nanak! My prayer to the Lord is that we may also get a glimpse of the Lord’s vision by reciting the Lord’s True Name in the company of holy saints and thus getting satiated. (2)

O, my soul! Let us sing the praises of the Lord with the · tongue as all our desires would be fulfilled and the fire of more worldly possessions would die down (get extinguished). O, my soul! The Lord enables a person, on whom He showers His blessings and favors, to inculcate Lord’s True Name in the heart, through His Grace. O, my soul! The person, who gets the company of a True Guru, gets the treasure of a glimpse of the Lord’s vision. O, Nanak! The Guru-minded persons, who are fortunate and pre-destined by the Lord’s Will, sing the Lord’s praises in the company of holy saints. (3)

O, my soul! The Lord-benefactor, who abides at a distant place and pervades everywhere at the same time, is omnipresent and prevails everywhere and in all beings in equal measure. O, my soul! No one knows the Lord’s greatness or His limits, in fact, the perfect Master is to decide on our actions. O, my soul! The Lord sustains all beings in the same manner as the mother and father look after the child.

O, Nanak! No one could attain the Lord through one’s cleverness or thousands of clever moves even. He could only be attained through the Guru’s guidance, by meditating on the True Name of the Lord like the Guru-minded persons. (4-6-Chhaka-1)

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Hindi Translation

बिहागड़ा महला ४ ॥ ( Sabh Jee Tere Tu Vartada ) हे मेरे हरि-प्रभु ! सभी जीव तेरे पैदा किए हुए हैं और सब के भीतर तू ही मौजूद है, ये जीव जो भी कर्म करते हैं, इस संबंध में तू सबकुछ जानता है। हे मेरी आत्मा ! हरि भीतर एवं बाहर सभी के साथ है तथा सबकुछ देखता है किन्तु अज्ञानी मानव अपने मन में किए पाप कर्मों से मुकर जाता है। हे मेरी आत्मा ! स्वेच्छाचारी लोगों से भगवान दूर ही रहता है तथा उनका तमाम परिश्रम निष्फल हो जाता है। हे मेरी आत्मा ! नानक ने गुरुमुख बनकर हरि की आराधना की है तथा वह हरि को हर तरफ प्रत्यक्ष ही देखता है॥ १॥

हे मेरी आत्मा ! वही सच्चे भक्त तथा सेवक हैं जो मेरे प्रभु के चित्त को लुभाते हैं। हे मेरी आत्मा ! हरि के दरबार में ऐसे सच्चे भक्तों एवं सेवकों को प्रतिष्ठा का वस्त्र पहनाया जाता है और वे रात-दिन सत्य में ही समाए रहते हैं। हे मेरी आत्मा ! उनकी संगति में रहने से विकारों की मैल उतर जाती है, जो प्राणी परमेश्वर के प्रेम-रंग में रंग जाता है और उस पर उसकी कृपा का चिन्ह अंकित हो जाता है। हे मेरी आत्मा ! नानक की प्रभु से विनती है कि वह साधुओं की संगति में रहकर तृप्त हो जाए॥ २॥

हे मेरी रसना ! परमात्मा का भजन कर, परमात्मा का भजन करने से तृष्णा मिट जाती है। हे मेरी आत्मा ! मेरा परब्रह्म जिस जीव पर भी दया करता है, वह उसके मन में अपने नाम को बसा देता है। जो व्यक्ति पूर्ण सतिगुरु से मिलता है, उसे हरि धन रूपी निधि प्राप्त हो जाती है। नानक का कथन है कि हे मेरी आत्मा ! सौभाग्य से ही सद्पुरुषों की संगति मिलती है, जहाँ भगवान का यशोगान होता रहता है।॥ ३॥

हे मेरी आत्मा ! परब्रह्म-प्रभु सब जीवों का दाता विश्व के कोने-कोने में बस रहा है, उसका अन्त नहीं पाया जा सकता है क्योंकि वह पूर्ण अकालपुरुष विधाता है। हे मेरी आत्मा ! वह सब जीवों का ऐसे भरण-पोषण करता है जैसे माता-पिता अपने बालक की परवरिश करते हैं। हे मेरी आत्मा ! हजारों चतुराईयों का प्रयोग करने पर भी परमात्मा नहीं मिलता किन्तु नानक ने गुरुमुख बनकर ईश्वर को समझ लिया है॥ ४॥ ६॥ छका १॥

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