ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਭਈ ਮਤਿ ਮਧਿਮ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਪਰਤੀਤਿ ਨਾਹੀ

Antar Agyan Bhai Mat Madham

Antar Agyan Bhai Mat Madham, Satgur Ki Parteet Naahi is Mukhwak by Sri Guru Ramdass Ji. It is documented on Ang 652 of Sri Guru Granth Sahib Ji in Raga Sorath Ki Vaar Pauri 26th with Shlokas.

HukamnamaAntar Agyan Bhai Mat Madham
PlaceDarbar Sri Harmandir Sahib Ji, Amritsar
Ang652
CreatorGuru Ram Dass Ji
RaagSorath
Date CENovember 20, 2022
Date NanakshahiMaghar 5, 554
FormatJPEG, PDF, Text, MPEG(Audio)
TranslationsPunjabi, English, Hindi
TransliterationsPunjabi, English, Hindi

ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਭਈ ਮਤਿ ਮਧਿਮ

Daily Hukamnama, Darbar Sahib Amritsar
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੪ ॥ ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਭਈ ਮਤਿ ਮਧਿਮ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ  ਪਰਤੀਤਿ ਨਾਹੀ ॥ ਅੰਦਰਿ ਕਪਟੁ ਸਭੁ ਕਪਟੋ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਕਪਟੇ ਖਪਹਿ ਖਪਾਹੀ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਭਾਣਾ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਆਪਣੈ ਸੁਆਇ ਫਿਰਾਹੀ ॥ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ਜੇ ਆਪਣੀ ਤਾ ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਸਮਾਹੀ ॥੧॥ਮਃ ੪ ॥ ਮਨਮੁਖ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪੇ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਮਨੂਆ ਥਿਰੁ ਨਾਹਿ ॥ ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਰਹਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਹਉਮੈ ਖਪਹਿ ਖਪਾਹਿ ॥ ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਮਹਾ ਗੁਬਾਰਾ ਤਿਨ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਕੋਈ ਜਾਹਿ ॥ ਓਇ ਆਪਿ ਦੁਖੀ ਸੁਖੁ ਕਬਹੂ ਨ ਪਾਵਹਿ ਜਨਮਿ ਮਰਹਿ ਮਰਿ ਜਾਹਿ ॥ ਨਾਨਕ ਬਖਸਿ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਜਿ ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਚਿਤੁ ਲਾਹਿ ॥੨॥ਪਉੜੀ ॥ ਸੰਤ ਭਗਤ ਪਰਵਾਣੁ ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਭਾਇਆ ॥ ਸੇਈ ਬਿਚਖਣ ਜੰਤ ਜਿਨੀ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਭੋਜਨੁ ਖਾਇਆ ॥ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਧੂਰਿ ਮਸਤਕਿ ਲਾਇਆ ॥ ਨਾਨਕ ਭਏ ਪੁਨੀਤ ਹਰਿ ਤੀਰਥਿ ਨਾਇਆ ॥੨੬॥

English Translation

Slok Mahalla 4 ( Antar Agyan Bhai Mat Madham )
The self-willed persons have no faith in the True Guru as they are engrossed in the darkness of ignorance and their wisdom is under the cover of darkness and filthy advice. They consider all others full of deceit and filth as they are deceitful and clever. They are always engrossed· in their own selfish motives and suffer along with other colleagues, as they do not follow the Will of the True Guru. O, Nanak! It is only through the Grace of the Lord that one gets imbued with the love of the Guru’s Word. (1)

Mahala 4th

The self-willed (faithless) persons are always engrossed in the love of the (Maya) worldly falsehood and greed and they do not enjoy peace of mind due to their dual-mindedness. They are constantly fretting and fuming (burning in the fire) with worldly desires by day and night and are always laboring under their egoistic tendencies and making others as well disgusted. Their heart is covered with the darkness of material greed, and as such, no one likes to join them – even. They neither enjoy bliss themselves nor enable others to have peace of mind and suffer the pangs of the cycle of births and deaths. O, Nanak! Even such faithless persons are pardoned by the True Lord provided they seek refuge at the lotus feet of the True Guru. (2)

Pouri

The person, who wins the love of the Lord, is accepted in the Lord’s presence as his saint. The persons, who have recited the True Name of their beloved True Master, are considered full of wisdom; as they have partaken in the (food nectar of the Lord’s True Name, and they have placed (applied) the dust of the lotus feet of the holy saints on their foreheads. O, Nanak! Such persons, who have applied the dust of the holy saints on their foreheads, have purified themselves and crossed the ocean of life successfully by (bathing at the holy place of the Lord) and imbibing the love of the Lord. (26)

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Hukamnama Meaning in Hindi

Antar Agyan Bhai Mat Madham

श्लोक महला ४॥
जिस जीव के मन में अज्ञान है उसकी तो बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई है, उसे सतगुरु के प्रति कोई आस्था नहीं।
जिसके मन में छल-कपट ही है, वह सबको कपटी ही समझता है और इस छल-कपट के कारण वह तबाह हो जाता है।
उसके मन में गुरु की रज़ा प्रविष्ट नहीं होती और वह तो अपने स्वार्थ के लिए ही भटकता रहता है।
हे नानक ! यदि ईश्वर अपनी कृपा करे तो ही वह शब्द में समा जाता है।॥ १॥

महला ४॥

मनमुख जीव माया के मोह में ही फँसे रहते हैं और द्वैतभाव के कारण उनका मन स्थिर नहीं होता।
वे तो दिन-रात तृष्णाग्नि में जलते रहते हैं और अहंकार में बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं (एवं दूसरों को भी नष्ट कर देते हैं)।
इनके मन में लोभ का घोर अन्धेरा है और कोई भी उनके निकट नहीं आता।
वे आप दुःखी रहते हैं और कभी भी उन्हें सुख की प्राप्ति नहीं होती। वे मर जाते हैं और जन्मते-मरते ही रहते हैं।
हे नानक ! जो अपना चित गुरु के चरणों में लगाते हैं, सच्चा प्रभु उन्हें क्षमा कर देता है॥ २॥

पउड़ी॥

जो प्रभु को अच्छा लगता है, वही संत एवं भक्त परवान हैं।
जिसने भगवान का ध्यान किया है, वही पुरुष चतुर है।
वह अमृत नाम का भोजन ग्रहण करता है, जो सर्व गुणों का भण्ड़ार है।
वह तो संतजनों की चरण-धूलि ही अपने माथे पर लगाता है।
हे नानक ! जिन्होंने हरि-नाम रूपी तीर्थ में स्नान किया है, वे पवित्र पावन हो गए हैं॥२६॥

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