Thursday, June 24, 2021

Aavoh Sajna Haon Dekha Darshan Tera Ram

HUKAMNAMA DARBAR SAHIB

Hukamnama Aavahu Sajjna Hao Dekha Darsan Tera Ram
Place Darbar Sri Harmandir Sahib Ji, Amritsar
Ang 764
Creator Guru Nanak Dev Ji
Raag Soohi
Date CE June 11, 2021
Date Nanakshahi Jeth 28, 553
Format JPEG, PDF, Text, MPEG(Audio)
Translations Punjabi, English, Hindi
Transliterations Punjabi, English, Hindi

Today’s Hukamnama Meaning

Rag Suhi Mahala • 1 Ghar • 3

Ik onkar satgur prasad ( Aavoh Sajna Haon Dekhan Darshan Tera Ram )

“By the Grace of the Lord-Sublime, Truth personified & attainable through the Guru’s guidance. ”

O, friendly, beloved Lord! I have a great craving and longing (in my heart) to perceive You within me and continue seeing You all the time. O, my Lord! Pray, listen to my prayer! I have only Your support, as such, I am longing to have a glimpse of our vision. The persons, who have perceived You, have purified their minds with their hearts filled with joy, having cast away the cycle of Rebirths. O, Lord! Your light pervades everywhere throughout the universe, and I am fortunate in having known You, as You have enabled me to unite with You effortlessly. (in the state of Equipoise) O, Nanak! I would offer myself as a sacrifice to my beloved Lord! O, Lord! It is through meditation of True Name that we are united with You within ourselves. (1)

O, friendly Lord! When You appear within my inner self (home) I enjoy the bliss of life, like a wedded woman; and when I developed good qualities, I was overjoyed and felt blissful by uniting with the Lord-spouse, immersed in His mirthful disposition. Then the Lord enabled me to attain peace in the love of the holy saints by ridding me of my vices, as the saints are an embodiment of the Lord Himself. O, Nanak! When the Lord considered our good qualities on our curbing the five vices like sexual desires, and how we deal with our fellow beings; the Lord appears within the body (of saints) where we could settle down in peace. O, Lord! We get the benefit of salvation through the recitation of True Name, which is attained from the Guru’s teachings alone. (2)

O, Lord! When the human being got united with the Lordspouse, like a wedded woman enjoying conjugal bliss, he got complete fulfillment of his inner desires and urges. Thus the individual gets merged with the Lord having realized the meaning of the Guru’s Word, thus perceiving the Lord pervading every being and everywhere, and not very far from us either.

Moreover, it dawned on us that the Lord-spouse belongs to all His disciples equally, having seen His presence in all beings, thus he cannot be considered far away. The Lord is, all in all, He Himself bestows on us all the comforts and joy and He alone enjoys the pleasures as well, as it pleases Him. We could attain such an imperishable, stable, invaluable, and great Lord through the Guru’s guidance alone. O, Nanak! We are united with the holy saints only through the Grace and munificence of the Lord so that we could inculcate the love of the Lord as the circumstances permit. (3)

O, Lord! You are abiding in the highest seat of the holy saints and You are the king of kings of all ages. In fact, I am wonderstruck to perceive Your grandeur resulting in my being mesmerized to find You pervading in all the beings equally well, and hearing the unstrung (all-pervasive) Music of Nature. Now I have gained the insignia of Lord’s True Name by pondering over Guru’s Word and improving the quality of my deeds. The self-willed persons. however, those who were devoid of True Name, did not find favor or acceptance in the Lord’s presence. The Guru-minded persons, who are accepted in the Lord’s Court, having acquired the boon of True Name, find all comforts of life as well.

O, Nanak! Such Guru-minded persons are received with honor in the Lord’s Presence, who have the Guru’s authority through His teachings; and they are saved from the cycle of births and deaths as well. They attain self-realization through the Guru’s ‘ guidance and become immortal like the Lord. So the true path of attaining the Lord through the acquisition of True Name in the company of the holy congregations is realized if the Grace of the Lord is bestowed on us! (4- 1- 3)

Ajj Da Hukamnama Darbar Sahib Amritsar
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਆਵਹੁ ਸਜਣਾ ਹਉ ਦੇਖਾ ਦਰਸਨੁ ਤੇਰਾ ਰਾਮ ॥ ਘਰਿ ਆਪਨੜੈ ਖੜੀ ਤਕਾ ਮੈ ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਨੇਰਾ ਰਾਮ ॥ ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਨੇਰਾ ਸੁਣਿ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰਾ ਮੈ ਤੇਰਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਭਈ ਨਿਹਕੇਵਲ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਨਾਸਾ ॥ ਸਗਲੀ ਜੋਤਿ ਜਾਤਾ ਤੂ ਸੋਈ ਮਿਲਿਆ ਭਾਇ ਸੁਭਾਏ ॥ ਨਾਨਕ ਸਾਜਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ਸਾਚਿ ਮਿਲੇ ਘਰਿ ਆਏ ॥੧॥ ਘਰਿ ਆਇਅੜੇ ਸਾਜਨਾ ਤਾ ਧਨ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਰਾਮ ॥ ਹਰਿ ਮੋਹਿਅੜੀ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਠਾਕੁਰ ਦੇਖਿ ਰਹੰਸੀ ਰਾਮ ॥ ਗੁਣ ਸੰਗਿ ਰਹੰਸੀ ਖਰੀ ਸਰਸੀ ਜਾ ਰਾਵੀ ਰੰਗਿ ਰਾਤੈ ॥ ਅਵਗਣ ਮਾਰਿ ਗੁਣੀ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ਪੂਰੈ ਪੁਰਖਿ ਬਿਧਾਤੈ ॥ ਤਸਕਰ ਮਾਰਿ ਵਸੀ ਪੰਚਾਇਣਿ ਅਦਲੁ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥ ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥ ਵਰੁ ਪਾਇਅੜਾ ਬਾਲੜੀਏ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਪੂਰੀ ਰਾਮ ॥ ਪਿਰਿ ਰਾਵਿਅੜੀ ਸਬਦਿ ਰਲੀ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਨਹ ਦੂਰੀ ਰਾਮ ॥ ਪ੍ਰਭੁ ਦੂਰਿ ਨ ਹੋਈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੋਈ ਤਿਸ ਕੀ ਨਾਰਿ ਸਬਾਈ ॥ ਆਪੇ ਰਸੀਆ ਆਪੇ ਰਾਵੇ ਜਿਉ ਤਿਸ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ॥ ਅਮਰ ਅਡੋਲੁ ਅਮੋਲੁ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥ ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਜੋਗ ਸਜੋਗੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਈਐ ॥੩॥ ਪਿਰੁ ਉਚੜੀਐ ਮਾੜੜੀਐ ਤਿਹੁ ਲੋਆ ਸਿਰਤਾਜਾ ਰਾਮ ॥ ਹਉ ਬਿਸਮ ਭਈ ਦੇਖਿ ਗੁਣਾ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਅਗਾਜਾ ਰਾਮ ॥ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨੀਸਾਣੋ ॥ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਖੋਟੇ ਨਹੀ ਠਾਹਰ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਪਰਵਾਣੋ ॥ ਪਤਿ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਪੂਰਾ ਪਰਵਾਨਾ ਨਾ ਆਵੈ ਨਾ ਜਾਸੀ ॥ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਪ੍ਰਭ ਜੈਸੇ ਅਵਿਨਾਸੀ ॥੪॥੧॥੩॥

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DownloadDated: 11-06-2021

Hukamnama in Hindi

[ Aavoh Sajna Hao Dekha Darshan Tera Ram ]

रागु सूही महला १ घर ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहु सजणा हउ देखा दरसन तेरा राम ॥
घर आपनड़ै खड़ी तका मै मन चाउ घनेरा राम ॥
मन चाउ घनेरा सुण प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥
दरसन देख भई निहकेवल जनम मरण दुख नासा ॥
सगली जोत जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥

नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥
घर आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥
हर मोहिअड़ी साच सबद ठाकुर देख रहंसी राम ॥
गुण संग रहंसी खरी सरसी जा रावी रंग रातै ॥
अवगण मार गुणी घर छाइआ पूरै पुरख बिधातै ॥
तसकर मार वसी पंचाइण अदल करे वीचारे ॥
नानक राम नाम निसतारा गुरमत मिलहि पिआरे ॥२॥

वर पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥
पिर राविअड़ी सबद रली रव रहिआ नह दूरी राम ॥
प्रभु दूर न होई घट घट सोई तिस की नार सबाई ॥
आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥
अमर अडोल अमोल अपारा गुर पूरै सच पाईऐ ॥
नानक आपे जोग सजोगी नदर करे लिव लाईऐ ॥३॥

पिर उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥
हउ बिसम भई देख गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥
सबद वीचारी करणी सारी राम नाम नीसाणो ॥
नाम बिना खोटे नही ठाहर नाम रतन परवाणो ॥
पत मत पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥
नानक गुरमुख आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥

Listen Aavoh Sajna Gurbani Audio

Aavoh Sajna Meaning in Hindi

[ Aavoh Sajna Hao Dekha Darshan Tera Ram ]

राग सूही में प्रथम गुरु की वाणी घर तीसरा
परमानन्द जो सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

हे मेरे प्रियतम-प्रभु! मेरे पास आओ, ताकि मैं तेरे दर्शन कर लूं।
मैं अपने हृदय-घर में खड़ी देखती रहती हूँ, तेरे दर्शन करने के लिए मेरे मन में बड़ा ही चाव है।
हे मेरे प्रभु! जरा सुनो, मन में बड़ा चाव है और मुझे तेरा ही भरोसा है। तेरे दर्शन करके मैं इच्छा-रहित हो गई हूँ और मेरे जन्म-मरण का दुख नाश हो गया है। सब जीवों में तेरी ही ज्योति है और मैंने जान लिया है कि वह ज्योति तू ही है। तू मुझे सहज-स्वभाव ही मिला है। हे नानक ! मैं अपने प्रभु पर बलिहारी जाती हूँ और वह सत्य नाम द्वारा मेरे हृदय-घर में आया है॥ १॥

जब प्रियतम प्रभु हृदय-घर में आया तो जीव-स्त्री बहुत प्रसून्न हुई। सच्चे शब्द द्वारा हरि ने उसे मोह लिया है और अपने ठाकुर जी को देखकर वह फूल की तरह खिल गयी है। जब प्रेम में रंगे हुए प्रभु ने रमण किया तो हां उसके गुणों से मुग्ध हो गयी और बहुत प्रसन्न हुई। पूर्ण पुरुष विधाता ने उसके अवगुणो को नाश करे उसका हृदय घर गुणों से बसा दिया है।काम, क्रोध, लोभ, मोह, एवं अहंकार, रूपी चोरों को मारकर वह जीव-स्त्री प्रभु-चरणों में बस गई है।हे नानक ! राम नाम ने उसे भवसागर से पार कर दिया है और गुरु उपदेश द्वारा अपने प्यारे प्रभु को मिल गई है॥ २॥

हे भाई ! नवयौवना जीव-स्त्री ने अपने पति-प्रभु को पा लिया है और उसकी आशा एवं अभिलाषा पूरी हो गई है। उसके पति -प्रभु ने उससे रमण किया है और अब वह शब्द में लीन हुई रहती है।सर्वव्यापक प्रभु उससे दूर नहीं जाता, वह प्रत्येक शरीर में मौजूद है और सब जीव-स्त्रियाँ उसकी पत्नियां हैं। वह स्वयं ही रसिया है, स्वयं ही रमण करता है और जैसे ही उसकी बड़ाई है। परमात्मा अमर, अटल, अमूल्य एवं अपार है और उस सत्यस्वरूप को पूर्ण गुरु द्वारा ही पाया जाता है। हे नानक ! परमात्मा स्वयं ही अपने साथ जीव-स्त्री के मिलाप का संयोग बनाने वाला है। जब वह अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो ही वह प्रभु में अपनी सुरति लगाती है॥ ३॥

मेरा पति-प्रभु एक ऊँचे महल में रहता है और वह तीनों लोकों का बादशाह है। मैं उसके गुणों को देखकर चकित हो गई हूँ और मेरे मन में अनहद शब्द गूंज रहा है। मैंने यह शुभ-कर्म किया है कि मैंने शब्द का चिंतन किया है और मुझे सत्य के दरबार में जाने के लिए राम नाम रूपी परवाना मिल गया है। खोटे व्यक्तियों को नाम के बिना प्रभु के दरबार में कोई स्थान नहीं मिलता। प्रभु को नाम रूपी रत्न ही स्वीकार होता है। जिस जीव-स्त्री की मति एवं प्रतिष्ठा पूर्ण है एवं पूर्ण नाम का परवाना है, वह जन्म एवं मृत्यु के चक्र से रहित है।हे नानक ! जो जीव-स्त्री गुरुमुख बनकर अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेती है, वह अविनाशी प्रभु का रूप ही बन जाती है॥ ४ ॥ १॥ ३ ॥

Hukamnama meaning in Punjabi

[ Aavoh Sajna Hao Dekha Darshan Tera Ram ]

ਹੇ ਸੱਜਣ-ਪ੍ਰਭੂ! ਆ, ਮੈਂ ਤੇਰਾ ਦਰਸਨ ਕਰ ਸਕਾਂ। (ਹੇ ਸੱਜਣ!) ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਪੂਰੀ ਸਾਵਧਾਨਤਾ ਨਾਲ ਤੇਰੀ ਉਡੀਕ ਕਰ ਰਹੀ ਹਾਂ, ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ ਬੜਾ ਹੀ ਚਾਉ ਹੈ (ਕਿ ਮੈਨੂੰ ਤੇਰਾ ਦਰਸਨ ਹੋਵੇ) । ਹੇ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਮੇਰੀ ਬੇਨਤੀ) ਸੁਣ, ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿਚ (ਤੇਰੇ ਦਰਸਨ ਲਈ) ਬੜਾ ਹੀ ਚਾਉ ਹੈ, ਮੈਨੂੰ ਆਸਰਾ ਭੀ ਤੇਰਾ ਹੀ ਹੈ।

(ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ!) ਜਿਸ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਨੇ ਤੇਰਾ ਦਰਸਨ ਕਰ ਲਿਆ, ਉਹ ਪਵਿੱਤ੍ਰ-ਆਤਮਾ ਹੋ ਗਈ, ਉਸ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦਾ ਦੁੱਖ ਦੂਰ ਹੋ ਗਿਆ। ਉਸ ਨੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਵਿਚ ਤੈਨੂੰ ਹੀ ਵੱਸਦਾ ਪਛਾਣ ਲਿਆ, ਉਸ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮ (ਦੀ ਖਿੱਚ) ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਤੂੰ ਉਸ ਨੂੰ ਮਿਲ ਪਿਆ।

ਹੇ ਨਾਨਕ! ਸੱਜਣ ਪ੍ਰਭੂ ਤੋਂ ਸਦਕੇ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਜੇਹੜੀ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਉਸ ਦੇ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਨਾਮ ਵਿਚ ਜੁੜਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਉਹ ਆ ਪ੍ਰਗਟਦਾ ਹੈ।੧।
ਜਦੋਂ ਸੱਜਣ-ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਦੇ ਹਿਰਦੇ-ਘਰ ਵਿਚ ਪਰਗਟਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਸੰਨ-ਚਿੱਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ ਸਾਲਾਹ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਖਿੱਚ ਪਾਈ, ਤਾਂ ਠਾਕੁਰ ਜੀ ਦਾ ਦਰਸਨ ਕਰ ਕੇ ਉਹ ਅਡੋਲ-ਚਿੱਤ ਹੋ ਗਈ।

ਜਦੋਂ ਪ੍ਰੇਮ-ਰੰਗ ਵਿਚ ਰੱਤੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੋੜਿਆ ਤਾਂ ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਗੁਣਾਂ (ਦੀ ਯਾਦ) ਵਿਚ ਅਡੋਲ-ਆਤਮਾ ਹੋ ਗਈ ਤੇ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਸੰਨ-ਚਿੱਤ ਹੋ ਗਈ। ਪੂਰਨ ਪੁਰਖ ਨੇ ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਨੇ (ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ) ਔਗੁਣ ਦੂਰ ਕਰ ਕੇ ਉਸ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਗੁਣਾਂ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।  ਕਾਮਾਦਿਕ ਚੋਰਾਂ ਨੂੰ ਮਾਰ ਕੇ ਉਹ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ (ਦੇ ਚਰਨਾਂ) ਵਿਚ ਟਿਕ ਗਈ ਜੋ ਸਦਾ ਪੂਰੀ ਵਿਚਾਰ ਨਾਲ ਨਿਆਂ ਕਰਦਾ ਹੈ।

ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਜੁੜਿਆਂ ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਈਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਤੇ ਤੁਰਿਆਂ ਪਿਆਰੇ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀ ਮਿਲ ਪੈਂਦੇ ਹਨ।੨।

ਜਿਸ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਨੇ ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ ਲੱਭ ਲਿਆ, ਉਸ ਦੀ ਹਰੇਕ ਆਸ ਉਸ ਦੀ ਹਰੇਕ ਇੱਛਾ ਪੂਰੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ (ਭਾਵ, ਉਸ ਦਾ ਮਨ ਦੁਨੀਆ ਦੀਆਂ ਆਸਾਂ ਆਦਿਕ ਵਲ ਨਹੀਂ ਦੌੜਦਾ ਭੱਜਦਾ) । ਜਿਸ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ-ਪਤੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੋੜ ਲਿਆ, ਜੋ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਪ੍ਰਭੂ ਵਿਚ ਲੀਨ ਹੋ ਗਈ, ਉਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ ਹਰ ਥਾਂ ਵਿਆਪਕ ਦਿੱਸਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਤੋਂ ਦੂਰ ਨਹੀਂ ਜਾਪਦਾ।

ਉਸ ਨੂੰ ਇਹ ਨਿਸ਼ਚਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਭੂ ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਨਹੀਂ ਹਰੇਕ ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਉਹੀ ਮੌਜੂਦ ਹੈ। ਸਾਰੀਆਂ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀਆਂ ਉਸੇ ਦੀਆਂ ਹੀ ਹਨ। ਉਹ ਆਪ ਹੀ ਆਨੰਦ ਦਾ ਸੋਮਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਉਸ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਉਹ ਆਪ ਹੀ ਆਪਣੇ ਮਿਲਾਪ ਦਾ ਆਨੰਦ ਦੇਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਮੌਤ-ਰਹਿਤ ਹੈ, ਮਾਇਆ ਵਿਚ ਡੋਲਦਾ ਨਹੀਂ ਉਸ ਦਾ ਮੁੱਲ ਨਹੀਂ ਪੈ ਸਕਦਾ (ਭਾਵ, ਕੋਈ ਪਦਾਰਥ ਉਸ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਨਹੀਂ) ਉਹ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਉਹ ਬੇਅੰਤ ਹੈ, ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਉਸ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।

ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਮੇਲ ਦੇ ਢੋ ਢੁਕਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਉਹ ਮੇਹਰ ਦੀ ਨਜ਼ਰ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਜੀਵ ਉਸ ਵਿਚ ਸੁਰਤਿ ਜੋੜਦਾ ਹੈ।੩।
ਪ੍ਰਭੂ-ਪਤੀ ਇਕ ਸੋਹਣੇ ਉੱਚੇ ਮਹਲ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਹੈ (ਜਿੱਥੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਨਹੀਂ ਪੈ ਸਕਦਾ) ਉਹ ਤਿੰਨਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਨਾਥ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਗੁਣ ਵੇਖ ਕੇ ਮੈਂ ਹੈਰਾਨ ਹੋ ਰਹੀ ਹਾਂ। ਚੌਹੀਂ ਪਾਸੀਂ (ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ) ਉਸ ਦੀ ਜੀਵਨ-ਰੌ ਇਕ-ਰਸ ਰੁਮਕ ਰਹੀ ਹੈ।

ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਨੂੰ ਵਿਚਾਰਦਾ ਹੈ (ਭਾਵ, ਆਪਣੇ ਮਨ ਵਿਚ ਵਸਾਂਦਾ ਹੈ) ਜਿਸ ਨੇ ਇਹ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਕਰਤੱਬ ਬਣਾ ਲਿਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਪਾਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ (ਰੂਪ) ਰਾਹਦਾਰੀ ਹੈ (ਉਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਵਿਚ ਥਾਂ ਮਿਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਪਰ) ਨਾਮ-ਹੀਣੇ ਖੋਟੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ (ਉਸ ਦੀ ਦਰਗਾਹ ਵਿਚ) ਥਾਂ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦੀ। (ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਦਰ ਤੇ) ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ-ਰਤਨ ਹੀ ਕਬੂਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਪਾਸ (ਪ੍ਰਭੂ-ਨਾਮ ਦਾ) ਅ-ਰੁਕ ਪਰਵਾਨਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ (ਪ੍ਰਭੂ-ਦਰ ਤੇ) ਪੂਰੀ ਇੱਜ਼ਤ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਅਕਲ ਉਕਾਈ-ਹੀਣ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੇ ਗੇੜ ਤੋਂ ਬਚ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
ਹੇ ਨਾਨਕ! ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਰਨ ਪੈ ਕੇ ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਪੜਤਾਲਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਅਬਿਨਾਸੀ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਰੂਪ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।੪।੧।੩।

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